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«किसानों से आवारा पशु परेशान, कैसे दर्द बंया करें बेजुबान»

“किसानों से आवारा पशु परेशान, आवारा पशुओं पर नकेल कसने का फरमान”
इस हेडिंग का सीधा-सीधा अर्थ यह है कि जब ग्राम पंचायत की सभी सरकारी जमीनों पर हमारा कब्जा है तो यह आवारा पशु बेचारे कहां जाएं ? हमने इनके चारागाह की जमीन से लेकर खलिहान, ग्राम समाज खेल-मैदान, तालाब आदि की जमीनों पर कब्जा करके खुद का मकान या फसल को उगा रखा है । अब ऐसे में इन बेचारे आवारा पशुओं के पास मात्र एक विकल्प बचा है, किसानों की फसल अर्थात हमारे खेत ।अगर ये हमारे खेत में खड़ी फसल को खा रहे हैं, उन्हें बर्बाद कर रहे हैं, तो उसका जिम्मेदार हमारे सिवा कोई दूसरा नहीं है। पहले यह काफी हद तक हमारी फसलों को नुकसान नहीं पहुंचा पाते थे लेकिन जब से सत्ता में आई राज्य की योगी सरकार ने आवारा पशुओं का वध करने पर रोक लगाई है तब से हमारी फसलें बर्बाद हो रही हैं और वह हों भी क्यों ना, आखिर कहीं ना कहीं इसके जिम्मेदार हम स्वयं हैं । हम रोज अखबारों में अपनी समस्याएं इन आवारा पशुओं को लेकर प्रकाशित करवा रहे हैं। हम थाने से लेकर जिलाधिकारी तक इनके संबंध में ज्ञापन दे रहे हैं कि आवारा पशुओं पर हमारी फसलों की सुरक्षा के लिए गौशालाएं बनवाई जाएं । मगर क्या आज तक हमने या हमारे किसी भी संगठन ने ग्राम पंचायत की भूमि पर हुए कब्जे जैसे खलिहान, तालाब, चारागाह आदि के बारे में ज्ञापन सौंपा या धरना दिया, कि माननीय अधिकारी महोदय हमने अपनी ग्राम पंचायत की सरकारी भूमि जो आवारा पशुओं के काम आ सकती थी पर कब्जा किया है, कृपया उसे कब्जा मुक्त कराएं, नहीं दिया क्योंकि हम जानते हैं कि अगर हम ऐसा करेंगे तो हम ही दोषी कहलाएंगे तो फिर यह आवारा पशु जो हमारे खेतों में खड़ी फसलों को खा रहे हैं किस प्रकार से दोषी हुए । ऊपर से राज्य सरकार ने भी इन पर नकेल कसने का आदेश पारित कर दिया। हम कहते हैं कि आए दिन आवारा पशुओं से सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं क्योंकि आवारा पशु सड़कों पर आ गए हैं। आखिर क्यों ना आएं हमने अपने खेतों में खड़ी फसलों को बचाने के लिए कटीले तार लगा रखे हैं, कहीं-कहीं तो उनमें करंट भी छोड़ रखा है तो अब इन आवारा पशुओं के पास सिर्फ और सिर्फ सड़कें ही बची हैं। थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि इन आवारा पशुओं को जंगल में छोड़ दिया जाए तो क्या यह वहां रुक कर अपने चारे-पानी का इंतजाम कर पाएंगे, नहीं कर सकते क्योंकि हम धीरे-धीरे जंगलों को भी उजाड़ कर खेत बनाने में जुटे हुए हैं। एक तरफ हम मांग करते हैं कि इन्हें गौशाला में रखकर इनको पाला जाए किस प्रकार इनके चारे पानी की व्यवस्था करेंगे हम । सरकार द्वारा दिया जाने वाला 3000 से 4000 रुपये मासिक वेतन ? कौन सा ऐसा व्यक्ति होगा जो इतने कम पैसों में 30 से 40 पशुओं की देखभाल कर पाएगा? उन्हें चारा खिलाना तो बहुत दूर की बात है वह उन्हें पानी तक नहीं पिला सकता। ऊपर से अगर कहीं कोई भी। पशु अपनी मौत से मर जाता है या हमारे द्वारा खेतों में लगाए गए कटीले तारों से घायल होकर मर जाता है तो कौन सा गौशाला सेवक या गौशाला प्रमुख अपने ऊपर बेवजह का मुकदमा पंजीकृत कराकर जेल की हवा खाना पसंद करेगा ?मान लीजिए अगर ऐसा नहीं हुआ तो कुछ संगठन उस गौशाला सेवक के खिलाफ धरने पर बैठकर कार्रवाई की मांग करने लग जाएंगे। बेचारा सोचेगा कि बेवजह मरने से अच्छा है कि चुपचाप कहीं भी जाकर मजदूरी कर ली जाए कम से कम प्रतिमाह ₹6000 तो बचेंगे और ऊपर से अपने घर-परिवार के साथ आराम से दो वक्त की रोटी खा कर चुपचाप चैन की नींद सोएगा। अब आखिर कोई बताएगा कि इन बेचारे आवारा पशुओं की गलती क्या है ? जो बेचारे बेजुबान होकर भी इधर-उधर दौड़ते घूम रहे हैं। हम कभी लाठी तो कभी भाला ले कर दौड़ आते हैं, कभी-कभी तो हममें से कई लोग इन्हें जान से तक मार देते हैं नहीं तो बूचड़खाने में कटने के लिए भेज देते हैं। आखिर हमारी थोड़ी सी फसल खाने वाले इन आवारा पशुओं की हत्या का कलंक हमारे सर पर लग ही जाता है और यह कलंक ना लगे इससे बचने का कुछ सरल उपाय यह है कि हमने इनकी जितनी भी जमीन पर कब्जा करके रखा हुआ है उसे कब्जा मुक्त कर दें। खलिहानों में ढेर सारे पेड़ लगाएं, तालाबों में पानी एकत्रित करने की व्यवस्था करें और चरागाहों की जमीन पर गांव के प्रत्येक घर से थोड़ा-थोड़ा सा चंदा लेकर वहां इनके खाने-पीने की व्यवस्था कर दें। जैसे उसमें चरी-बाजरा या हरी घास की बुवाई कर दें। अगर फिर भी यह हमारी फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं तो हर सरकारी भूमि जो इनके उपयोग में आ सकती है, उस भूमि के चारों ओर दीवार उठाकर या कटीले तार लगाकर उन जगहों की घेराबंदी करा दें और प्रत्येक घर से गांव के कुछ ऐसे लोगों का चुनाव करें जो बदल-बदल कर इन्हें चारागाह की जमीन से निकालकर तालाब तक छोड़ दें और फिर वापस तालाब से लाकर इन्हें चारागाह की उसी भूमि के अंदर बंद कर दें। तब कहीं जाकर शायद हमारी समस्या का समाधान हो सके ।अन्यथा की स्थिति में हम इनकी प्रजातियों को हमेशा के लिए खो तो देंगे ही इसके साथ ही अन्य समस्याओं जैसे दूध, दही, घी, गैस या ईंधन आदि की व्यवस्था को भी खोने से बचा नहीं पाएंगे।
विमलेश कुमार तहसील रिपोर्टर पुवायां

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